दूरदर्शिता से प्रगति के पथ पर ले जाने वाले: बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर


हम अमृत काल की उस दहलीज पर हैं जिसकी संपूर्ण शताब्दी पूरी होने में 25 वर्ष का समय है। और उस समय राष्ट्र स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष में प्रवेश करेगा। मौजूदा अमृत महोत्सव राष्ट्र की विकास-गति की एक रूपरेखा प्रस्तुत करता है। हमारे पूर्वजों ने इस संबंध में अपनी स्पष्ट दूरदृष्टि को प्रस्तुत किया था जिसके फलस्वरूप हमारी अब तक की प्रगति हुई है। नए भारत के निर्माण के इस व्यापक कार्य के परिप्रेक्ष्य में कई क्षेत्रों में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की प्रेरणादायी दूरदृष्टि और सतर्कतापूर्ण दृष्टिकोण हमेशा एक मार्गदर्शी प्रकाश-स्तम्भ के रूप में हमारे साथ हैं। उनकी 131वीं जयंती एक राष्ट्र निर्माता के रूप में उनकी समग्र भूमिका का स्मरण करने और हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक कार्य क्षेत्रों में उनके आदर्शों का अनुकरण करने के लिए पुनः दृढ़ संकल्प और प्रेरित होने का एक उपयुक्त अवसर है।

डॉ. अम्बेडकर ने एक संस्था निर्माता के रूप में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभायी और वर्तमान समय की संवैधानिक व्यवस्था ने उनकी बुद्धिमत्ता और ज्ञान को चारों दिशाओं में गुंजायमान किया है। वे संविधान सभा में वाद-विवाद में सबसे महत्वपूर्ण वक्ता थे। इस क्षेत्र में संपूर्ण वार्तालाप में सर्वाधिक योगदान अर्थात् 7.5 प्रतिशत बाबासाहेब का ही रहा, जबकि नेहरू का योगदान 2.14 प्रतिशत रहा। भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉ. अम्बेडकर के ‘रुपए की समस्या-इसकी उत्पत्ति और समाधान’ विषयक शोध-पत्र को अपनी कार्यप्रणाली का मूलाधार बनाया। वायसराय की कार्यकारी परिषद के लेबर मेम्बर के रूप में उन्होंने जल, बिजली, श्रम कल्याण नीतियों को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केंद्रीय जल आयोग, केंद्रीय तकनीकी बिजली बोर्ड और नदी घाटी प्राधिकरणों की स्थापना करके एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन करना आदि वे महत्वपूर्ण कार्य हैं जिन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के उपलब्ध पूल का इष्टतम उपयोग करने संबंधी इच्छा शक्ति को एक साकार रूप प्रदान किया। उन्होंने केंद्र और राज्य के हितों को जोखिम में डाले बिना अपने आर्थिक स्तर को उतरोत्तर ऊपर उठाने के प्रयोजनार्थ केंद्र और राज्यों के बीच एक संघीय वित्त प्रणाली को विकसित करने में बड़ा योगदान दिया। 

वे दलित वर्ग के लिए तर्कसंगत आवाज बुलंद करने वाले श्रमिक अधिकारों के एक कट्टर पैरोकार थे। एक श्रमिक नेता के रूप में उन्होंने ‘कार्य की उचित स्थिति’ की बजाय ‘श्रमिक के जीवन की उचित स्थिति’ की हिमायत की। अन्य कल्याणकारी कार्यों यथा काम के घंटों को घटाकर प्रति सप्ताह 48 घंटे करना, ओवर टाइम और सवेतन अवकाश (पेड लीव) की व्यवस्था, न्यूनतम पारिश्रमिक का निर्धारण और उसकी सुनिश्चितता, श्रम कल्याण कोष तथा ट्रेड यूनियनों की स्वीकार्यता को अक्षरशः लागू किया गया। काश्तकारों के बीच दास परम्परा का उन्मूलन, भू-पट्टे में खोती प्रणाली का उन्मूलन तथा श्रमिकों की हड़ताल संबंधी अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए औद्योगिक विवाद विधेयक 1938 का कड़ा विरोध किया गया था। 

डॉ. अम्बेडकर आधुनिक समाज में महिलाओं की प्रगतिशील भूमिका के प्रति बहुत जागरूक थे और उन्होंने सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार के भाग के रूप में स्वतंत्रता के तुरंत बाद महिलाओं के लिए मतदान अधिकार सुनिश्चित कराने की हिमायत की। उल्लेखनीय है कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों ने महिलाओं को मत का अधिकार देने में एक शताब्दी से भी अधिक का समय लिया। हिंदू कोड बिल में उन्होंने महिलाओं को, गोद लेने के अधिकार के साथ-साथ, विरासत का अधिकार प्रदान करने की भी वकालत की। आर्थिक कार्यबल में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को सुविधाजनक बनाने के लिए उन्होंने लैंगिक भेदभाव के बिना ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ के प्राबधानों को सुनिश्चित किया और कोयला खदानों में भूमि के अंदर कार्य करने वाली महिलाओं पर पाबंदी हटाने संबंधी विषय में सार्थक हस्तक्षेप किया। उन्होंने इन सुदृढ़ आधारभूत बातों को संस्थागत बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसके फलस्वरूप अब महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में किसी भी कार्य को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं तथा हर संभव क्षेत्र में हमारे राष्ट्र को गौरवान्वित कर रही हैं। 

25 नवबंर, 1949 को संविधान सभा में अपने समापन भाषण के दौरान डॉ. अम्बेडकर ने एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य की व्यवस्था के माध्यम से राजनीतिक समानता प्राप्त करने पर संतोष की अनुभूति को व्यक्त किया। इसके बावजूद उन्होंने सामाजिक और आर्थिक मोर्चों पर संबंधित मूल्यों में मौजूदा मतभेदों के कारण आने वाले विरोधाभासों के बारे में आगाह किया। तथापि, पिछले 8 वर्षों में मोदी सरकार द्वारा की गई पहल इन विरोधाभासों को दूर कर रही है और राष्ट्र डॉ. भीम राव अम्बेडकर की दूरदृष्टि के करीब पहुंचता जा रहा है। ‘सबका साथ-सबका-विकास सबका-विश्वास- सबका प्रयास’ से अभिप्रेत है कि यह देश के हर आदमी तक की समावेशिता और लोगों की असीमित प्रतिभाओं के उत्थान और संवर्धन के लिए सरकार के बहु आयामी प्रयासों का एकीकरण सुनिश्चित करता है। 

अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन में एक वर्ष की समय-सीमा में नेहरू  सरकार की देरी और इस निष्क्रियता के प्रति उनका उदासीन रवैया उन चार कारणों में से एक था जिसके कारण 1951 में नेहरू मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र दे दिया। वर्ष 2018 में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के संवैधानिक स्तर को आगे बढ़ाने और तदुपरांत सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की पहचान करने के संबंध में राज्यों को अनुमति दिये जाने के लिए किया गया 105वाँ संवैधानिक संशोधन न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की दिशा में उठाए गए कदम हैं। 

ऐतिहासिक अभिलेख विभिन्न मामलों में अम्बेडकर और नेहरू के बीच मतभेद को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। डाॅ. अंबेडकर ने जम्मू-कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने, पाकिस्तान के साथ उठाए गए मामलों के गलत प्रबंधन, पूर्वी बंगाल के हिंदुओं की दुर्दशा और उच्च सैन्य खर्च के संबंध में विदेश नीति का विरोध किया। 26 अगस्त 1954 में राज्यसभा में बोलते हुए बाबासाहेब ने नेहरू की विदेष नीति की आलोचना करते हुए कहा था कि भारत की विदेष नीति (नेहरू नीति) का सूत्र हमारी समस्या नहीं, दूसरे देषों की समस्याओं का हल करना बन गया है। चीन का लटासा (तिब्बत) प्र कब्जा और हम चुप रहे, चीन ने बौद्धों पर अत्याचार किए, हम चुप रहे। हमारा बफर स्टेट समाप्त हो गया, कभी चीन हम पर आक्रमण भी कर सकता है। राष्ट्र को उनको प्रबंधनों की भारी कीमत अदा करनी पड़ी जिसके फलस्वरूप पड़ोसी देश के साथ युद्ध हुआ और जम्मू और कश्मीर के बेगुनाह लोग राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़े विकास कार्यक्रमों से वंचित हो गए। संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त करने से जम्मू और कश्मीर के लोगों के साथ विकास के नतीजों को साझा करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। उन्होंने साम्यवादियों की विदेशी अंधभक्ति की आलोचना की और राष्ट्रीय प्रगति की राह में उनकी दोमुंही नीति पर देश को सचेत किया। 

भाजपा स्थापना दिवस पर ‘सामाजिक न्याय पखवाड़ा’ मनाने का विचार डाॅ. अंबेडकर के आदर्शों के प्रति परस्पर सदभावना को व्यक्त करता है। सरकारी कार्यक्रम सकारात्मक बदलाव लाने और विशेष रूप से सभी, वंचित और दलित वर्ग के लोगों के जीवन को सरल और सहज बनाने की दिशा में कार्यरत हो रहे हैं। पंच तीर्थ के विकास तथा डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र एवं गरीब समर्थित कल्याण योजनाओं जैसे कि स्टैंडअप, स्टार्टअप स्कीम, मुद्रा एवं उद्यम पूंजी कोष स्कीम, एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल निर्माण स्कीम, प्रधानमंत्री आवास योजना, आयुष्मान भारत, किसान सम्मान निधि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, स्वच्छ भारत अभियान आदि स्कीमों का क्रियान्वयन होने से लोगों के जीवन का स्तर बढ़ रहा है। संशोधित पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति स्कीम में चार करोड़ अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को उच्चतर शिक्षा सुविधा प्रदान करने की व्यवस्था की गई है। कामगारों की उचित जीवन दशा पर ध्यान केंद्रित करते हुए चार श्रम संहिताएं अर्थात् पारिश्रमिक संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता, और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता बनाई गई हैं। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण अनुसंधान प्रयोगशाला, लखनऊ द्वारा बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की निजी वस्तुओं के परिरक्षण के लिए एक परियोजना शुरू की जा रही है। इन वस्तुओं को नागपुर, महाराष्ट्र के चिंचोली नामक स्थान में प्रस्तावित अनुसंधान केंद्र एवं संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाएगा। 

आज, डॉ. अम्बेडकर जी की 131 वीं जयंती के अवसर पर, आइए हम सभी इस पावन अवसर पर उन्हें याद करें और उन सुखद सपनों में को साकार करें जो सपने हमारे पूर्वजों और गुमनाम नायकों द्वारा देखे गए थे। आइए, हम अपने सत्कार्यों से एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण करने और अपने राष्ट्र को नई ऊँचाइयों तक ले जाने की ओर अग्रसर हों, ताकि इसका प्रभाव पूरे विश्व में गुंजायमान हो तथा हमारे प्रिय देश में समन्वय और भाईचारे की भावना बलवती हो। 

अर्जुन राम मेघवाल*

*केंद्रीय संस्कृति एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री और संसद सदस्य, बीकानेर*

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