कभी प्रेम, कभी घृणा से काटी जाती बोटियां....... हर बार धोखे और विश्वासघात से सहमती और सिसकती है बेटिया

लखनऊ (मानवी मीडिया)कभी प्रेम, कभी घृणा से काटी जाती बोटियां.......  हर बार धोखे और विश्वासघात से सहमती और सिसकती है बेटिया

      लगभग हर रोज आप पेपर उठाते हैं तो महिला के शोषण के खबर पढ़ते हैं, इसी क्रम में कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है जो रूह को भी हिला दे,  जो आपकी रातों की नींद उड़ा दे और आप चिंतित हो जाएं कि आप उसी समाज में रहते हैं जहां रोज जहां एक तरफ किसी न किसी बेटी को या तो प्रेम के नाम पर स्वीकृति न मिलने पर तेजाब डालकर जला दिया जाता है या छत से फेंक दिया जाता है दूसरी तरफ़ प्रेम को स्वीकार करने पर, अनचाहे शारीरिक संबंधों के लिए विवश किया जाता है तो कहीं बोटी बोटी काट कर फेंक दिया जाता है। कही बेटियों को प्रेम के जाल में फंसा कर देह व्यापार की अंधेरी कोठियों में ढकेल दिया जाता है।

       निश्चित रूप से आप भी सोचते होंगे प्रेम है क्या?? क्या आज के कलयुगी समाज में प्रेम सिर्फ वासना शारीरिक भोग और बेटियों को खिलौना समझने के सिवा कुछ नहीं है।  प्रेम का कोई पाठ्यक्रम नहीं बना और ना ही परिवारों ने , समाज ने,कभी किसी को प्रेम करने की इजाज़त ही दी, फिर भी यह परंपरा यह भावनात्मक लगाव और खिंचाव सदियों से चला रहा है। खुद को चाहे जाने की तमन्ना रखना, फिर वह महिला हो या पुरुष दोनों के लिए नैसर्गिक प्राकृतिक गुण ईश्वर के द्वारा प्रदान किया गया है।

     अगर सब कुछ सही है तो फिर समस्या कहां है हम सबको सोचना होगा। क्या आज समाज में नैतिक और व्यवहारिक ज्ञान कुछ ज्यादा ही दिया जा रहा है ?क्या हमने बच्चों में सभी का खून का रंग लाल है यह पाठ ज्यादा पढ़ा दिया है। जब हम बचपन से हिन्दू मुसलमान,जाति, बिरादरी ,ऊंच-नीच अलग-अलग उपजातियां, बच्चों को बताते ही नहीं तो बाद में हम उन्हें हिंदू मुसलमान जाति और उपजाति की दुहाई देकर जीवनसाथी चुनने पर बेड़ियां क्यों लगाते हैं?????

      वैश्वीकरण के युग में हम कितने भी आधुनिक हो जाएं, पश्चिम देशों से लिव इन रिलेशनशिप या कहें सहमति संबंध , या बालिग होते ही शारीरिक संबंध, स्त्री– स्त्री से संबंध पुरुष– पुरुष से संबंध ले तो आए हैं कुछ रिश्तो को मान्यता भी दे रहे हैं पर क्या यह भारत की सभ्यता और संस्कृति में स्वीकार हो पाएगा???? आपका जवाब होगा निश्चित रूप से नहीं। 

             वैश्वीकरण के नाम पर जो खिड़की और दरवाजे हमने खोल रखे हैं उनमें यदि समय के साथ फिल्टर नहीं लगाया तो शायद प्रदूषित हवा से हमारा समाज हमारे संस्कार और सभ्यता नष्ट हो जाएंगे। स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर हमें  विद्यालय के स्तर से बच्चों को कराना आज अति आवश्यक हो गया है।

       यदि सामाजिक समस्या आम समस्या होती जा रही है तो निश्चित रूप से इसका समाधान भी हम सबको मिलकर सोचना ही होगा कब तक जन्म से लेकर मृत्यु की  शैया तक एक बच्ची, एक युवती, एक महिला प्रताड़ित होती रहेगी............ बस नाम उम्र और जाति  अलग हो सकती हैं।

      यदि प्रेम के नाम पर धोखा विश्वास यह जबरदस्ती प्रेम करने के लिए किसी को दूसरे व्यक्ति द्वारा प्रताड़ित किया जाता है उस प्रताड़ना को अपराध की श्रेणी तक ले जाया जाता है तो फिर हमारी न्याय व्यवस्था ऐसे लोगों को त्वरित न्याय देते हुए सजा क्यों नहीं देती क्यों किसी अबला को जिसकी बूटियों काट दी जाती हैं मरने के बाद भी उसके पेज पर गालियां सुननी पड़ती हैं क्यों हर बार रेप होने वाली बच्ची से लेकर युवती को सामाजिक ताने सुनने पड़ते हैं, कई मामलों में तो प्रेम के नाम पर अश्लील वीडियो बनाकर बच्ची के माता-पिता को ही भेज दिए जाते हैं, आप कल्पना करें उस पिता के ऊपर क्या बीती होगी या तो वह अपनी बेटी की हत्या कर दे या खुद फांसी पर लटक जाए एक विचित्र शर्मसार करने वाली मनोदशा परिवारों को झेलनी पड़ती है....... क्यों हम सरेआम अपराधियों को सजा का प्रावधान नहीं करते।

     आज होने वाले हर अपराध का क्या कारण सिर्फ और सिर्फ हमारी दंड व्यवस्था ही है, जो कि इतनी शिथिल है कि एक जीवन खत्म होते-होते भी प्रताड़ना सहने वाली युवती को न्याय नहीं मिलता और समाज  भटके हुए युवाओं को यह संदेश जरूर दे जाता है कि अपराध करें बस अच्छा वकील करें आप इज्जत आबरू से समाज में जी सकते हैं।

      कब तक सांत्वनाओं का खेल चलता रहेगा ?क्यों हम नागरिक अपनी न्याय व्यवस्था और दंड व्यवस्था को कड़ा करने के लिए एकजुट नहीं हो पा रहे ।

आइए मिलकर सोचे , मनन करें हमारा समाज प्रेम के नाम पर कहां जा रहे हैं??

रीना त्रिपाठी


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