बसपा, कांग्रेस के न होने से दलित वोट होगा निर्णायक

मैनपुरी (मानवी मीडिया): समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के दिवंगत होने पर रिक्त हुई मैनपुरी सीट पर लोकसभा का उपचुनाव पांच दिसंबर को होगा। सपा की गढ़ माने जानी वाली इस सीट पर मुलायम की बहू और भाजपा की ओर से रघुनाथ शाक्य के मैदान में आने से टक्कर बड़े कांटे की है। लेकिन बसपा कांग्रेस के चुनाव मैदान में न होने से दलित वोटर निर्णायक भूमिका में होंगे।

मैनपुरी सीट से वर्ष 1996 में पहली बार सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव मैदान में उतरे और जीत हासिल की थी। इसके बाद यहां सपा को कोई हरा नहीं सका। राजनीतिक पंडितों की मानें तो मैनपुरी के चुनाव जातीय आधार पर ही लड़े गए हैं। उपचुनाव में भी मुद्दों या लहर से इतर सपा और भाजपा दोनों की निगाह जातीय समीकरण पर ही है। सपा का जोर जहां यादव, मुस्लिम के अलावा अन्य जातियों में सेंधमारी करने का है। वहीं भाजपा ने शाक्य प्रत्याशी उतार कर दूर की गोटी फेंकी है। भाजपा की कोशिश शाक्य प्रत्याशी के सहारे क्षत्रिय, ब्राह्मण, लोधी और वैश्य वोट बैंक के साथ चुनावी वैतरणी पार करने की है।

अगर चुनावी आंकड़ों को देखें तो मैनपुरी में बसपा ने कई लोकसभा चुनाव लड़े, जीत भले न दर्ज की हो लेकिन प्रदर्शन हमेशा अच्छा रहा है। अपने कोर वोटर की बदौलत दो नंबर पर भी रही है। उपचुनाव में बसपा भले ही भाग न ले रही हो लेकिन सभी दलों की नजर अब बसपा के कोर वोट बैंक पर है। जिस दल-प्रत्याशी को बसपा का वोट मिलेगा, उसी को चुनाव में सफलता मिलेगी।

अगर वर्ष 2009 की बात करें तो लोकसभा चुनाव में सपा को टक्कर दलित वोट के बल पर बसपा ने दी थी। भले जीत न मिल पाई हो लेकिन बसपा प्रत्याशी विनय शाक्य को 2.19 लाख वोट मिले थे। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा प्रत्याशी डॉ. संघमित्रा मौर्य ने 1.42 लाख वोट मुलायम के गढ़ में हासिल किए थे। 2019 में बसपा ने सपा के साथ गठबंधन के कारण लोकसभा चुनाव मैनपुरी सीट पर नहीं लड़ा। 2019 यहां से सपा संरक्षक मुलायम सिंह 5,24,926 वोट पाकर चुनाव जीते थे। इतना अधिक वोट उस स्थित में मिला था जब सपा और बसपा मिलकर चुनाव लड़े थे और भाजपा उम्मीदवार करीब 94 हजार वोट से हारा था। आज की स्थिति में जब बसपा और कांग्रेस चुनावी आखाड़े से बाहर है उस समय ऊंट किस करवट बैठेगा यह निश्चित ही दलित वोट तय करेगा।

स्थानीय विश्लेषकों की मानें तो भाजपा जानती है की दलित वोटर के सहारे नईया पार हो सकती है। इसी कारण उसने इस वोट बैंक को रिझाने के लिए सरकार के मंत्री असीम अरुण और सांसद रामशंकर कठेरिया को लगाया है। इसके साथ दलित वर्ग अन्य कई नेता भी इस वोट बैंक पर सेंधमारी के लिए लगे हैं। भाजपा के महामंत्री संगठन धर्मपाल खुद इस सीट पर फोकस कर रहे हैं। वह खुद इस सीट के लिए दो बार जा चुके हैं। बूथ लेवल तक मीटिंग कर चुके हैं। इसके अलावा हर छोटे बड़े कार्यकर्ता पूरी ताकत से जुटा है।

उधर सपा ने भी दलित वोट बैंक और शाक्य बिरादरी के वोटरों को रिझाने के लिए बसपा से आए कई बड़े नेता को मैदान में उतारा है। जो घूम घूम कर सपा के पक्ष में माहौल बना सके।

मुस्लिम और यादव (एमवाई) के साथ दलित वोट बैंक को साधे रखने पर पार्टी का जोर है। दलित नेताओं को गांव-गांव डेरा डालने का निर्देश दिया गया है। लेकिन एक पुराने चले आ रहे एक मुहावरे की मानें तो दलित वोटर यादव के साथ जाने में संकोच करता है। यह कई बार के चुनावो में यह देखने को मिला है। अगर इस बार भी ऐसा होता है तो सपा के लिए काफी मुश्किल हो सकती है।

राजनीतिक दलों के आंकड़ों को अगर मानें तो पूरी लोकसभा में तकरीबन 17 लाख वोटर हैं। यादव मतदाता करीब 4.30 लाख है। जबकि शाक्य 2.80 लाख है। इसके बाद दलित वोट करीब 1.80 लाख हैं। दो लाख से ज्यादा ठाकुर, एक लाख 20 हजार ब्राम्हण हैं। एक लाख लोधी, 60 हजार मुस्लिम, 70 हजार वैश्य हैं। परिणाम कुछ भी हो लेकिन मुकाबला बड़ा रोचक होने वाले है।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक पीएन द्विवेदी कहते हैं कि मैनपुरी के उपचुनाव में इस बार सपा भाजपा की सीधी लड़ाई है। जातियों के समीकरण के हिसाब से देखें तो कोई किसी से कम नहीं है। सपा मुलायम की विरासत को बचाने के लिए लड़ रही है। तो भाजपा सीट जीतकर बढ़त लेना चाहती है। भाजपा जानती है कि अगर मैनपुरी सीट उनकी झोली में आ गई तो आने वाले समय में उनकी राह और भी आसान होगी। द्विवेदी कहते हैं कि यहां के समीकरण को देखें जाटव वोट निर्णायक भूमिका है। इसीलिए दोनों दल इन्हे रिझाने में लगे हैं।

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