कमाने की क्षमता रखने वाला पति पत्नी से स्थायी गुजारा भत्ता नहीं मांग सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट

लखनऊ (मानवी मीडिया) हिंदू विवाह अधिनियम | कमाने की क्षमता रखने वाला पति पत्नी से स्थायी गुजारा भत्ता नहीं मांग सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट

🔘कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि कमाने की क्षमता रखने वाला सक्षम व्यक्ति पत्नी से तलाक पर स्थायी गुजारा भत्ता की मांग नहीं कर सकता। 

⚫ *जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस जे एम खाजी की खंडपीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25* के तहत पत्नी से स्थायी गुजारा भत्ता की मांग करने वाले टी.सदानंद पई द्वारा दायर अपील खारिज कर दी। 

🟤पीठ ने कहा, "अपीलकर्ता सक्षम शरीर वाला व्यक्ति है और उसके पास कमाने की क्षमता है। इसलिए फैमिली कोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा अधिनियम की धारा 25 के तहत दायर याचिका खारिज कर दी।"

🟢अपीलकर्ता-पति के अनुसार, प्रतिवादी-पत्नी ने बच्चे के जन्म से पहले फरवरी 1994 में वैवाहिक घर छोड़ दिया। यह भी विवाद में नहीं है कि विवाह से पक्षों को पुत्र की प्राप्ति हुई। हालांकि, बेटे के जन्म के बावजूद प्रतिवादी गृहस्थी में शामिल नहीं हुआ। 

🔵बाद में अपीलकर्ता ने याचिका दायर कर विवाह भंग करने की मांग की। उक्त कार्यवाही में अपीलकर्ता ने पत्नी से स्थायी गुजारा भत्ता की मांग करते हुए याचिका दायर की। 

🟡फैमिली कोर्ट ने दिनांक 19.08.2015 के निर्णय के द्वारा तलाक की डिक्री द्वारा विवाह को भंग कर दिया। हालांकि, अपीलकर्ता द्वारा अधिनियम की धारा 25 के तहत दायर याचिका को खारिज कर दिया।

🟠यह प्रस्तुत किया गया कि प्रतिवादी (पूर्व पत्नी) सहकारी समिति में सहायक प्रबंधक के रूप में कार्यरत है। अपीलकर्ता मंदिर में अनुबंध के आधार पर सुरक्षा गार्ड के रूप में कार्यरत है। हालांकि, उसने नौकरी खो दी है और कमाने का कोई साधन नहीं है। 

🟣पत्नी ने तर्क दिया कि वह 8,000 रुपये के मासिक वेतन पर भ्रामावरा में सहकारी समिति में सहायक प्रबंधक के रूप में कार्यरत है और उसे बेटे की देखभाल करनी है, जिसकी उम्र लगभग 15 वर्ष है

*जांच - परिणाम:

🛑पीठ ने कहा कि स्थायी गुजारा भत्ता से संबंधित मुद्दे को निर्धारित करने के लिए पक्षकारों की स्थिति पति या पत्नी की उचित चाहत, स्वतंत्र आय और दावेदार की संपत्ति प्रासंगिक कारक हैं, जिन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए।

*इसके बाद कोर्ट ने कहा,*

🔴"मौजूदा मामले में अपीलकर्ता ने स्वीकार किया कि उसके पिता की जमीन में उसका हिस्सा है और उसका आवासीय घर में भी हिस्सा है। यह आगे स्वीकार किया गया कि उपरोक्त संपत्तियां मूल्यवान संपत्तियां हैं।"

*यह भी ध्यान में रखा गया कि* 


👉🏽अपीलकर्ता ने बच्चे की देखभाल नहीं की और बेटे की शिक्षा के लिए काफी खर्च करने की आवश्यकता है और उसी का बोझ प्रतिवादी पर डाला गया है। तदनुसार कोर्ट ने कहा, 

*"उपरोक्त कारणों से हम आक्षेपित निर्णय और डिक्री में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाते।"*

*केस टाइटल: टी. सदानंद पाई बनाम सुजाता एस पाई*

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