किसानों के नाम पर घातक राजनीति       संपादकीय     - मानवी मीडिया

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Tuesday, November 17, 2020

किसानों के नाम पर घातक राजनीति       संपादकीय    

देशहित के मुद्दों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, यह बार बार दोहराया जाता है लेकिन आज का विपक्ष हर मुद्दे पर राजनीति करने की लालसा छोड़ नहीं पाता है। किसी भी देश में विदेश नीति और रक्षा नीति पर राजनीति नहीं होती है लेकिन हमारे देश में 2०14 के बाद हर मुद्दे पर राजनीति की जा रही है। वास्तव में कांग्रेस हमेशा सत्ता में रही है, इसलिए वो विपक्ष की भूमिका को निभाना नहीं जानती। कांग्रेस सत्ता से दूरी बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। कांग्रेस दोबारा सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई दे रही है लेकिन वास्तविकता यह है कि सत्ता पाने की जल्दबाजी के कारण वो सत्ता से और दूर होती जा रही है। देशहित के मुद्दे पर राजनीति जनता को पसंद नहीं आती, यह बात भारी राजनीतिक नुकसान उठाने के बावजूद कांग्रेस अभी तक समझ नहीं पाई है।  केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि सुधार कानून का विरोध करने के लिए कांग्रेस ने सभी हदें पार कर दी हैं। किसानों का विरोध समझ आता है क्योंकि इन कानूनों से फायदा होगा लेकिन कुछ नुकसान भी हो सकता है। सरकार कुछ भी कहे लेकिन यह एक सच्चाई है कि इन कानूनों के कारण मंडी व्यवस्था खत्म होने की आशंका है। बेशक मोदी सरकार यह वायदा कर रही है कि मंडी व्यवस्था बनी रहेगी। अब सवाल उठता है कि क्या मंडी व्यवस्था के खत्म होने की आशंका के आधार पर इन कानूनों का विरोध उचित है।  जहाँ तक किसानों की बात है तो उनका विरोध जायज है लेकिन उस हद तक जब तक सरकार से अच्छी तरह यह मनवा लिया जाए कि मंडी व्यवस्था को बनाए रखा जाएगा। भविष्य में जो होगा, किसानों को भविष्य के लिए छोड़ देना चाहिए। यदि सरकार के वायदे के बावजूद मंडी व्यवस्था खत्म करने की कोशिश की जाती है तो किसान तब भी अपना विरोध कर सकते हैं। तब ज्यादा उचित होगा और जनता की सहानुभूति भी उन्हें मिलेगी। विपक्ष का किसानों को भड़काना देश के लिए घातक है क्योंकि वो भी कई राज्यों में सत्ता में है और जब कुछ भी गलत होगा तो उसे सुधारने में उसकी भूमिका भी होगी।  वैसे देखा जाए तो मंडी व्यवस्था खत्म होने की सम्भावना इसलिए कम है क्योंकि सरकार को अपने सुरक्षित खाद्य भंडारण के लिए मंडी की जरूरत बनी रहेगी। दूसरी तरफ गरीब कल्याण योजना के अंतर्गत सस्ता अनाज देने के लिए केंद्र सरकार को मंडी की जरूरत रहेगी। इन कारणों से मोदी सरकार गेंहू और धान की खरीद पिछली यूपीए सरकार से कई गुना ज्यादा कर रही है। किसानों का विरोध करने का तरीका उचित नहीं है। पंजाब में रेलवे का परिचालन ठप्प करना और निजी कंपनियों के दफ्तरों के आगे धरना देना पंजाब को बर्बादी की ओर ले जाना है। टोल प्लाजा बंद करना भी उचित नहीं है। किसानों के विरोध को कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त है। सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने किसानों को समझाने की जगह भड़काया है। सत्ताधारी दल होने के कारण कांग्रेस की जिम्मेदारी थी कि किसानों के विरोध के कारण राज्य को नुकसान न होने पाए लेकिन मोदी सरकार को घेरने के चक्कर में कांग्रेस ने कृषि कानून के बारे में गलतफहमिया पैदा करने की कोशिश की है।  किसानों के विरोध को पूंजीपतियों की तरफ मोड़ दिया गया है। निजी कंपनियों और टोल प्लाजा के खिलाफ किसानों की कार्यवाही गलत मानसिकता की वजह से है। किसानों के आंदोलन के कारण पंजाब के उद्योग बरबाद हो रहे हैं लेकिन किसान सुनने को तैयार नहीं हैं। बिजली उत्पादन बंद होने की कगार पर पहुँच गया है। रेलवे परिचालन बंद होने के कारण यात्रियों को बहुत परेशानी हो रही है। जिन किसानों को केंद्र के खिलाफ भड़काया गया था , अब वो राज्य सरकार की भी सुनने को तैयार नहीं हैं। देखा जाए तो कुल मिलाकर परिस्थितियां राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर होती जा रही हैं।  कुछ दिनों पहले पंजाब के मुख्यमंत्री श्री अमरेंद्र सिंह जी विदेशी निवेश लाने की कोशिश में जुटे हुए दिखाई दे रहे थे लेकिन अब हालात ऐसे होते जा रहे हैं कि पंजाब के उद्योगपति दूसरे राज्यों की ओर जा सकते हैं। किसान आंदोलन पूंजीपतियों के खिलाफ बनता जा रहा है और इसका संदेश पूरी दुनिया में जा रहा है जिसका खामियाजा सिर्फ पंजाब ही नहीं बल्कि पूरे देश को किसी को भी कृषि कानूनों के खिलाफ माहौल बनाने का अधिकार नहीं है। किसानों की जो आशंकाए हैं, उसका निवारण केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर करना चाहिए। अगर केंद्र यह कानून किसानों के हित के लिए लाया है तो यह जिम्मेदारी भी केंद्र की है कि वो किसानों को कानून का फायदा समझाए। विपक्षी दलों को भी किसानों को भड़काने से बाज आना चाहिए क्योंकि पंजाब को ठप्प करने का अंतिम खामियाजा किसानों को ही भुगतना पड़ेगा। किसान सिर्फ खेती नहीं करते हैं, वे उद्योगपति भी हैं और व्यापारी भी। विदेशी और देशी कंपनियां का विरोध करने का कोई तुक नहीं है क्योंकि ये कंपनियां कृषि से ज्यादा रोजगार और सम्पदा पंजाब के लिए पैदा करती हैं। 


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