अनुसूचित जातियों और जनजातियों के अधिकारों पर कुठाराघात-- राष्ट्रीय प्रवक्ता विश्व हिंदू परिषद

लखनऊ (मानवी मीडिया)दुर्भाग्यवश हिंदू समाज में अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग को सामाजिक शैक्षणिक व आर्थिक आधार पर भेदभाव का सामना करना पड़ता रहा है इसलिए हिंदू समाज का यह भाग सामाजिक शैक्षणिक व आर्थिक रूप से पिछड़ा रहा है*

-1935 में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के मध्य पुणे में हुई एक वार्ता के अनुसार इन वर्गों को आरक्षण दिए जाने पर एक व्यापक सहमति बनी थी तथा धर्म के आधार पर पृथक निर्वाचन को राष्ट्र विरोधी घोषित किया गया था

-1936 में ही ईसाई मिशनरी व मुस्लिम नेताओं ने ईसाई व मुस्लिम पंथ में मतांतरित अनुसूचित जाति के लोगों को भी आरक्षण की मांग उठाई थी जिसे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी ने तार्किकता के साथ नकार दिया था

-संविधान सभा में भी जब अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण की मांग की गई तब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने मत आंतरिक अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण की मांग को ठुकराते हुए इसे अनुचित सिद्ध किया था

-1950 में एक संवैधानिक आदेश जारी कर यह स्पष्ट कर दिया था कि हिंदू अनुसूचित जाति को आरक्षण सुविधा मिलेगी

-इसके बावजूद ईसाई मिशनरी अपनी अनुचित मांग के लिए निरंतर प्रयास करते रहे हैं पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित कई प्रधानमंत्रियों ने इस मांग को हमेशा अनुचित सिद्ध करके इसे ठुकरा दिया था।

 राजीव गांधी, देवगौड़ा मनमोहन सिंह ने इस मांग को स्वीकार करने का प्रयास किया परंतु राष्ट्रव्यापी प्रचंड विरोध के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा 2005 में सच्चर कमेटी व 2009 में रंगनाथ कमेटी ने इस पक्ष में कुछ अनुशंसा की थी परंतु अपने अंतर्विरोध व गलत कार्य विधि के कारण वे दोनों विवादित बन गए और इनको क्रियान्वयन नहीं किया जा सका

-ईसाई मिशनरी व मौलवी जो अपने पंथ में सामाजिक समानता का दावा करते हैं इस मांग को 1936 से लगातार बड़ी प्रबलता के साथ उठाते हुए सामाजिक समानता के अपने दावे को स्वयं ही बार-बार ध्वस्त करते रहे हैं और अपने दोहरे चरित्र को उजागर करते रहे हैं सामाजिक समानता व पिछड़ों की सेवा की ध्वजवाहक माने जाने वाली स्वर्गीय मदर टेरेसा भी इस मांग को लेकर 1995 में एक दिवसीय धरने में भी सम्मिलित हुई थी

*मतांतरित अनुसूचित जाति आरक्षण व न्यायपालिका*

-ईसाई मिशनरी इस अनुचित मांग के लिए केवल सड़क और संसद में ही नहीं न्यायपालिका में भी निरंतर सक्रिय रहे हैं,परंतु न्यायपालिका ने भी इसको हर बार अतार्किक व असंवैधानिक बताकर ठुकरा दिया है। 30/9/1985 को सुसाइ व अन्य विरुद्ध भारत सरकार के मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था की संविधान आदेश 1950 और इस में किए गए संशोधन संविधान सम्मत है और हिंदू सिख बौद्ध अनुसूचित जाति के अलावा किसी को भी यह आरक्षण नहीं दिया जा सकता ।आरसी पौडयाल, सोमनाथ पौडयाल, नंदू थापा ,रूपराज राय आदि मामलों में संविधान आदेश 1950 के प्रावधानों को उचित व न्याय संगत माना गया

-2004 में भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय में सी पी आई एल एवं अन्य के द्वारा दायर की गई ऐसी ही एक याचिका जो अभी तक लंबित है के संदर्भ में वर्तमान केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस्लाम और ईसाई मतों में मत मतांतरित अनुसूचित जाति की आरक्षण की मांग न्याय संगत नहीं है

*ईसाई इस्लाम पंथ में मतांतरित अनुसूचित जातियों को आरक्षण के दुष्परिणाम*

-भारत में तेजी से मतान्तरण बढ़ेगा क्योंकि प्रतिबंधित पीएफआई सहित कई संगठन हैं जो अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र व सहायता से ईसाइयत व इस्लाम में धर्मांतरण के प्रयास करते रहते हैं। इनके यह षड्यंत्र कई बार उजागर हो चुके हैं।

-ईसाई संगठन स्वयं स्वीकार करते हैं कि भारत की आबादी का 4% छद्म इसाई है जो आरक्षण की सुविधा छीने जाने के डर से अपने आप को ईसाई घोषित नहीं करते। यह सुविधा मिलते ही वे अपने आप को ईसाई घोषित करेंगे।

धर्मांतरण की इस संभावित बाढ़ के कारण भारत में कई क्षेत्रों में जनसंख्या असंतुलन की समस्या भीषण रूप धारण कर लेगी। जम्मू-कश्मीर केरल बंगाल पूर्वोत्तर हरियाणा उत्तर प्रदेश बिहार आदि के कई जिलों में इसके परिणाम देखे जा सकते हैं वहां न केवल पांथिक असहिष्णुता बढ़ी है, अपितु भारत की पहचान व सर्व पंथ समभाव पूर्णरूपेण समाप्त हो गए हैं।

-भारत की अनुसूचित समाज के अधिकार मतान्तरितों द्वारा छीन लिए जाएंगे।अपने धनबल राजनीतिक प्रभाव व अंतरराष्ट्रीय समर्थन के कारण वे आरक्षण के सभी क्षेत्रों में अपना कब्जा जमा लेंगे ,और जिस अनुसूचित समाज के लिए आरक्षण का प्रावधान किया है वह उस से पूर्ण रुप से वंचित हो जाएंगे। 

*मतांतरित अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण के दुष्परिणाम*

-अनुसूचित जातियों के विषय में मतांतरित अनुसूचित जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता, इसलिए अनुसूचित जातियां अपने आरक्षण को बचा पा रही हैं। दुर्भाग्य से यह लाभ जनजातियों को नहीं है, इसलिए जनजातीय आरक्षण का 80% लाभ 18% मतांतरित जनजाति उठा रही हैं ,और 82% वास्तविक जनजाति केवल 20% लाभ ही ले पा रही हैं।

-2004 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केरल विरुद्ध चंद्रमोहन मामले में यह स्पष्ट किया था, की अगर कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म त्याग देता है, और अपनी परंपरा रीति रिवाज ,पूजा पद्धति और संस्कारों को छोड़ देता है, तो उसे जनजाति नहीं माना जाएगा, और किसी भी प्रकार के आरक्षण का लाभ उसको नहीं मिलेगा, इस निर्णय के बावजूद दुर्भाग्य से मतांतरित जनजातियां आरक्षण के प्रावधान पर कब्जा कर रही हैं, और मतान्तरण करने वाली शक्तियां खुलकर अपने षड्यंत्र को लागू कर पा रही हैं।

-मतांतरित जनजातियां दोहरे लाभ ले रही हैं, वे जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण के अलावा अल्पसंख्यक आधार पर भी सुविधाएं प्राप्त करती हैं। समय-समय पर मतांतरित जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण का सशक्त विरोध होता रहा है। 1967 में स्वर्गीय कार्तिक उरांव के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ यह सशक्त विरोध निरंतर चलता रहा है। विश्व हिंदू परिषद ने भी 2021 में अपनी प्रबंध समिति में इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया था ,और देश भर में व्यापक जन जागरण का कार्य भी किया था।

*अब समय आ गया है कि मतांतरित अनुसूचित जातियों को आरक्षण दिलाने वाले सभी षड्यंत्र को पूर्ण रूप से रोका जाए, और मतांतरित अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण पर रोक लगाई जाए। यह दोनों प्रयास राष्ट्रहित में हैं, और देश की सामाजिक ताने-बाने और ढांचे को सुरक्षित रखने के लिए भी आवश्यक है।*  


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