उ0प्र0 में बुलडोजर र्कारवाई के खिलाफ याचिका कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश’

 

नई दिल्ली (मानवी मीडिया): उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि जमीयत-उलमा-ए-हिंद द्वारा दायर हस्तक्षेप आवेदन और कुछ नहीं बल्कि ‘प्रॉक्सी मुकदमेबाजी’ है और कानपुर में आंशिक रूप से ध्वस्त दो संपत्तियों के मालिकों ने निर्माण की अवैधता को पहले ही स्वीकार कर लिया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने एक हलफनामे में कहा, “उत्तर प्रदेश में कानून के मुताबिक कार्रवाई की गई है। जिन लोगों ने अवैध निर्माण किया था, प्रशासन ने उन्हीं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की है। आवेदक द्वारा राज्य के सर्वोच्च संवैधानिक पदाधिकारियों का नाम लेने और स्थानीय विकास प्राधिकरण के वैध कार्यों को सामूहिक प्रतिशोध की एक विधि के रूप में गलत तरीके से लेबल करने का प्रयास किया गया है। इस तरह के आरोप पूरी तरह से झूठे हैं और इसका जोरदार खंडन किया गया है।”

राज्य सरकार ने कहा कि विध्वंस के खिलाफ याचिकाएं अदालतों को गुमराह करने के लिए दायर की गई थीं। जून में, जमीयत उलमा-ए-हिंद ने प्रयागराज, कानपुर और सहारनपुर में प्रशासन द्वारा आरोपियों के घरों को ध्वस्त करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जो कथित रूप से पूर्व भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा की पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी के बाद हिंसक विरोध प्रदर्शन में शामिल थे।

राज्य सरकार ने कहा, “सहारनपुर जिले में आवेदक द्वारा बताए गए विध्वंस के दो मामले सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण के मामले हैं और वहां से उन्हें हटाना कानून के अनुसार था।”

हलफनामे में कहा गया, “आवेदक अपने प्रत्युत्तर में काउंटर हलफनामे द्वारा रिकॉर्ड में लाए गए तथ्य को संबोधित करने में विफल रहा है कि कानपुर में आंशिक रूप से हटाए गए दो अवैध निर्माणों के मालिकों ने पहले ही निर्माण की अवैधता को स्वीकार कर लिया है और इसके लिए कंपाउंडिंग आवेदन जमा कर दिए हैं।”

जमीयत की याचिका में यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि अतिरिक्त कानूनी दंडात्मक उपाय के रूप में किसी भी आपराधिक कार्यवाही में किसी भी आरोपी की आवासीय या वाणिज्यिक संपत्ति के खिलाफ कानपुर में कोई कार्रवाई नहीं की जाए। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि सहारनपुर विध्वंस ‘वैध’ था और इस आरोप का भी खंडन किया कि विध्वंस का विरोध करते हुए एक नाबालिग लड़के को गिरफ्तार किया गया था। 

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