राजद्रोह' कानून खत्म करने की मांग वाली याचिकाओं पर नहीं आया सरकार का जवाब


नई दिल्ली (मानवी मीडिया): भारतीय दंड संहिता की धारा 124 -ए (राजद्रोह) की वैधता को चुनौती देते हुए उसे रद्द करने के निर्देश देने की मांग संबंधी याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिए केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय से अतिरिक्त समय देने की गुहार लगाई है।मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमना, न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की विशेष पीठ ने 27 अप्रैल को सुनवाई करते हुए सरकार को 30 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने को कहा था। पीठ ने साथ ही इस मामले के निपटारे के लिए सुनवाई की तारीख पांच मई मुकर्रर करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा था कि एक साल से लंबित इस मामले में स्थगन आदेश की कोई अर्जी स्वीकार नहीं की जाएगी।

सरकार ने एक नया आवेदन पत्र दायर करके कहा है कि जवाब तैयार है, लेकिन संबंधित अथॉरिटी से स्वीकृति मिलना अभी बाकी है। लिहाजा, इस मामले में कुछ अतिरिक्त समय चाहिए। शीर्ष अदालत ने इस मामले में आखिरी सुनवाई जुलाई 2021 को होने का जिक्र करते हुए शीघ्र निपटाने के उद्देश्य से सरकार से 30 अप्रैल तक जवाब दाखिल करने को कहा था। राजद्रोह के तहत अधिकतम सजा के रूप में आजीवन कारावास वाले इस कानून पर मुख्य न्यायाधीश ने पिछली सुनवाई पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद उन्हें केंद्र की ओर से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत की तीन सदस्यीय विशेष पीठ के समक्ष श्री मेहता ने अपनी ओर से कहा था कि याचिकाओं पर जवाब लगभग तैयार है। श्री मेहता ने उसे (जवाब को) अंतिम रूप देने के लिए दो दिनों का समय देने की गुहार लगाई थी। इस पर पीठ ने कहा था कि सप्ताह के अंत तक जवाब दाखिल कर दें। मैसूर स्थित मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एस जी वोम्बटकेरे, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया एवं अन्य की ओर से याचिकाएं दाखिल की गई थी।

सर्वोच्च अदालत ने याचिकाओं की सुनवाई करते हुए (15 जुलाई 2021 को) राजद्रोह कानून के प्रावधान के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त व्यक्त करने के साथ ही सवाल करते हुए कहा था कि स्वतंत्रता के लगभग 75 वर्षों के बाद भी इस कानून की क्या आवश्यकता है?

सर्वोच्च अदालत ने विशेष तौर पर 'केदार नाथ सिंह' मामले (1962) में स्पष्ट किया था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए के तहत केवल वे कार्य राजद्रोह की श्रेणी में आते है, जिनमें हिंसा या हिंसा को उकसाने के तत्व शामिल हों। शीर्ष अदालत के समक्ष दायर याचिकाओं में कहा गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए संविधान के अनुच्छेद 19(1) (ए) के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार उल्लंघन करती है।

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