सहकारिता आर्थिक स्वालंबन का मार्ग


लखनऊ (मानवी मीडिया / मानवेंद्र प्रताप सिंह)आर्थिक स्वालंबन के दौर से गुजर रहे भारत में प्रचीन समय से ही आर्थिक स्वालंबन के प्रबंधन का हमेशा से विस्तार किया गया हमारे वेदों , पुराणों और उपनिषद में भी आर्थिक स्वालम्बन का उल्लेख किया गया है एक समय भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार पहली सदी से लेकर दसवीं सदी तक भारत  की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। पहली सदी में भारत का सकल घरेलु उत्पाद विश्व के कुल जीडीपी का 32.9% था प्राचीन  कालखंड में कुटीर और सहकारिता के माध्यम से भारत मसालों और सिल्क कपड़ो का बड़ा निर्यातक देश था लेकिन भारत के आजादी के बाद के शासन काल लिए गए गलत निर्णय के भारत का कुटीर और सहकारिता दोनों क्षेत्रो लगभग शुन्य की तरफ बढ़ रहे थे लेकिन 2014 के बाद मोदी सरकार के लगातार सार्थक और कड़े निर्णय लेने की वजह से आज भारत आज विश्व निर्यात में अपनी धमक बढ़ा रहा है आज भारत की सबसे बड़ी जरुरत सहकारिता के माध्यम से देश के सभी वर्गों को रोजगार प्रदान करने की है  भारत में आर्थिक विकास को गति देने के उद्देश्य से सहकारिता आंदोलन को सफल बनाना बहुत जरूरी है। वैसे तो हमारे देश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1904 से हुई है एवं तब से आज तक सहकारी क्षेत्र में लाखों समितियों की स्थापना हुई है। कुछ अत्यधिक सफल रही हैं, जैसे अमूल डेयरी, परंतु इस प्रकार की सफलता की कहानियां बहुत कम ही रही हैं। कहा जाता है कि देश में सहकारिता आंदोलन को जिस तरह से सफल होना चाहिए था, वैसा हुआ नहीं है। बल्कि, भारत में सहकारिता आंदोलन में कई प्रकार की कमियां ही दिखाई दी हैं। देश की अर्थव्यवस्था को यदि वर्ष 2023 तक 5 लाख करोड़ अमेरिकी डालर के आकार का बनाना है तो देश में सहकारिता आंदोलन को भी सफल बनाना ही होगा। इस दृष्टि से हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा एक नए सहकारिता मंत्रालय का गठन किया गया है। भारतीय संसद में वित्तीय वर्ष 2021-22 का बजट पेश करते समय भी सहकारिता मंत्रालय के गठन की चर्चा की गई थी। विशेष रूप से गठित किए गए इस सहकारिता मंत्रालय से अब न केवल सहकारिता आंदोलन के सफल होने की आशा की जा रही हैं बल्कि “सहकार से समृद्धि” की परिकल्पना के साकार होने की उम्मीद भी की जा रही है।

भारत में सहकारिता आंदोलन का यदि सहकारिता की संरचना की दृष्टि से आंकलन किया जाय तो देखने में आता है कि देश में आज 8.5 लाख से अधिक सहकारी साख समितियां कार्यरत हैं। इन समितियों में कुल सदस्य संख्या 28 करोड़ है। हमारे देश में आज 55 किस्मों की सहकारी समितियां विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं। जैसे, देश में 1.5 लाख प्राथमिक दुग्ध सहकारी समितियां कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त 93,000 प्राथमिक कृषि सहकारी साख समितियां कार्यरत हैं। विभिन क्षेत्रों में कार्यरत सहकारी समितियों के अतिरिक्त देश में सहकारी क्षेत्र में तीन प्रकार के बैंक भी कार्यरत हैं। एक, प्राथमिक शहरी सहकारी बैंक जिनकी संख्या 1550 है और ये देश के लगभग सभी जिलों में कार्यरत हैं। दूसरे, 300 जिला सहकारी बैंक कार्यरत हैं एवं तीसरे, प्रत्येक राज्य में एपेक्स सहकारी बैंक भी बनाए 

गए हैं।

सहकारिता के क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए एक प्रभावी प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में हुआ। 2002 में मल्टी स्टेट कोआपरेटिव एक्ट के जरिए सहकारी संस्था के एक से अधिक राज्यों में परिचालन गतिविधियों से जुड़ा कानून बनाया गया। इसके बाद 2011 में संविधान के 97वें संशोधन के जरिए केंद्र और राज्यों में सहकारी गतिविधियों को एकरुपता प्रदान करने की कोशिश की गई। जाहिर अब इस क्षेत्र की भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए नए कानून और पॉलिसी फ्रेमवर्क की जरुरत पड़ेगी। केंद्र को एक ऐसा सहकारिता कानून बनाना होगा, जो इस क्षेत्र में केंद्र और राज्यों की नीतियों में एकरुपता लेकर आए। वैसे भी, सहकारिता के बढ़ते कदमों को राज्यों के अलग-अलग कानून और पेचीदगियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। मोदी सरकार सहकारी गतिविधियों को परिचालन स्वतंत्रता दिए जाने की अपनी प्रतिबद्धता पर आगे बढ़ती नजर आ रही है। पिछले बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने सहकारिताओं में भी ईज आॅफ डुइंग के मानक लागू करने की घोषणा की थी। सहकारिता मंत्रालय के गठन का विरोध कर रहे वामदल के कुछ नेता इसे संघवाद पर कथित हमला तो करार दे रहे हैं, लेकिन कानून और नियमन के बिना सहकारिता की सेहत कैसे सुधरेंगी इस पर खामोश हैं। केंद्र सरकार द्वारा इससे पहले भी सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने के लिए कदम उठाए गए हैं। गत वर्ष ही मल्टी स्टेट कोआपरेटिव बैंक को रिजर्ब बैंक की निगरानी के दायरे में लाया गया है। इससे 1540 सहकारी बैंकों के साढ़े आठ करोड़ से अधिक खाताधारकों की मेहनत की कमाई सुरक्षित हुई है। मल्टी स्टेट को-आॅपरेटिव सोसाइटीज एक्ट में संशोधन कर खुले बाजार से आर्थिक संसाधन जुटाने को स्वीकृति प्रदान की गई। इससे बहुराज्यीय सहकारी समितियों की दक्षता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।


इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि हमारे देश में सहकारी आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। दुग्ध क्षेत्र में अमूल सहकारी समिती लगभग 70 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई है, जिसे आज भी सहकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी सफलता के रूप में गिना जाता है। सहकारी क्षेत्र में स्थापित की गई समितियों द्वारा रोजगार के कई नए अवसर निर्मित किए गए हैं। सहकारी क्षेत्र में एक विशेषता यह पाई जाती है कि इन समितियों में सामान्यतः निर्णय सभी सदस्यों द्वारा मिलकर लिए जाते हैं। सहकारी क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में अपनी अहम भूमिका निभा सकता है। परंतु इस क्षेत्र में बहुत सारी चुनौतियां भी रही हैं। जैसे, सहकारी बैंकों की कार्य प्रणाली को दिशा देने एवं इनके कार्यों को प्रभावशाली तरीके से नियंत्रित करने के लिए अपेक्स स्तर पर कोई संस्थान नहीं है। जिस प्रकार अन्य बैकों पर भारतीय रिजर्व बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थानों का नियंत्रण रहता है ऐसा सहकारी क्षेत्र के बैकों पर नहीं है। इसीलिए सहकारी क्षेत्र के बैंकों की कार्य पद्धति पर हमेशा से ही आरोप लगते रहे हैं एवं कई तरह की धोखेबाजी की घटनाएं समय समय पर उजागर होती रही हैं। इसके विपरीत सरकारी क्षेत्र के बैंकों का प्रबंधन बहुत पेशेवर, अनुभवी एवं सक्रिय रहा है। ये बैंक जोखिम प्रबंधन की पेशेवर नीतियों पर चलते आए हैं जिसके कारण इन बैंकों की विकास यात्रा अनुकरणीय रही है। सहकारी क्षेत्र के बैंकों में पेशेवर प्रबंधन का अभाव रहा है एवं ये बैंक पूंजी बाजार से पूंजी जुटा पाने में भी सफल नहीं रहे हैं। अभी तक चूंकि सहकारी क्षेत्र के संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी तंत्र का अभाव था अतः अब केंद्र सरकार द्वारा किए गए नए मंत्रालय के गठन के बाद सहकारी क्षेत्र के संस्थानों को नियंत्रित करने में कसावट आएगी एवं इन संस्थानों का प्रबंधन भी पेशेवर बन जाएगा जिसके चलते इन संस्थानों की कार्य प्रणाली में भी निश्चित ही सुधार होगा।

शहरी क्षेत्रों में गृह निर्माण सहकारी समितियों का गठन किया जाना भी अब समय की मांग बन गया है क्योंकि शहरी क्षेत्रों में मकानों के अभाव में बहुत बड़ी जनसंख्या झुग्गी झोपड़ियों में रहने को विवश है। अतः इन गृह निर्माण सहकारी समितियों द्वारा मकानों को बनाने के काम को गति दी जा सकती है। देश में आवश्यक वस्तुओं को उचित दामों पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कंजूमर सहकारी समितियों का भी अभाव है। पहिले इस तरह के संस्थानों द्वारा देश में अच्छा कार्य किया गया है। इससे मुद्रा स्फीति की समस्या को भी हल किया जा सकता है।

देश में व्यापार एवं निर्माण कार्यों को आसान बनाने के उद्देश्य से “ईज आफ डूइंग बिजिनेस” के क्षेत्र में जो कार्य किया जा रहा है उसे सहकारी संस्थानों पर भी लागू किया जाना चाहिए ताकि इस क्षेत्र में भी काम करना आसान हो सके। सहकारी संस्थानों को पूंजी की कमी नहीं हो इस हेतु भी प्रयास किए जाने चाहिए। केवल ऋण के ऊपर अत्यधिक निर्भरता भी ठीक नहीं है। सहकारी क्षेत्र के संस्थान भी पूंजी बाजार से पूंजी जुटा सकें ऐसी व्यवस्था की जा सकती हैं।

अब चूंकि केंद्र सरकार द्वारा सहकारी क्षेत्र में नए मंत्रालय का गठन किया गया है तब यह आशा की जानी चाहिए के सहकारी क्षेत्र में भी पेशेवर लोग आकर्षित होने लगेंगे और इस क्षेत्र को सफल बनाने में अपना भरपूर योगदान दे सकेंगे। साथ ही, अमूल की तर्ज पर अन्य क्षेत्रों में भी सहकारी समितियों द्वारा सफलता की कहानियां लिखी जाएंगी ऐसी आशा की जा रही है। “सहकारिता से विकास” का मंत्र पूरे भारत में सफलता पूर्वक लागू होने से गरीब किसान और लघु व्यवसायी बड़ी संख्या में सशक्त हो जाएंगे।

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