राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उ0प्र0 लखनऊ की मासिक काव्य संगोष्ठी का आयोजन

 


लखनऊ (मानवी मीडिया) राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उत्तर प्रदेश लखनऊ की मासिक काव्य संगोष्ठी का आयोजन नियमित रूप से किया जाता है। चूंकि माह अप्रैल 2021 से एक विकट राष्ट्रीय आपदा/ कोरोना महामारी के कारण इस कारवां को क्षणिक विश्राम मिला।  अब जब वातावरण में सुखद परिवर्तन हो चुका है तो एक बार इस साहित्यिक यात्रा को पुन: आगे बढ़ाने का निर्णय संस्थान द्वारा लिया गया।  इस जून/2021 माह की प्रथम काव्य संध्या दिनांक 19.06.2021 को  चंद्रदेव दीक्षित और द्वितीय पाली की काव्य संध्या दिनांक 20.06.2021 रविवार की सायं 6.00 बजे से 7.15 बजे तक  केवल प्रसाद सत्यम के संयोजन व संचालन में आयोजित किया गया।

द्वितीय पाली की काव्य संगोष्ठी में कुल नौ कवियों के स्थान पर सिर्फ पांच लोगों की उपस्थिति संभव हुई।  संस्था की महामंत्री डा. शोभा दीक्षित भावना और श्रवण कुमार सेठ, सुशील चंद श्रीवास्तव, सदस्य शासकीय कार्यों की व्यस्तता के कारण नहीं जुड़े। जबकि  अजय कुमार त्रिपाठी जी, (एस. डी. एम.) संत कबीर नगर का नेटवर्क धीमा होने के कारण आप गोष्ठी से नहीं जुड़ सके। फलत: गोष्ठी अपने समय से दस मिनट देरी से शुरू हुई।

आज की काव्य गोष्ठी के अध्यक्ष सुनील कुमार बाजपेई , मुख्य अतिथि अजय कुमार त्रिपाठी (सम्मिलित होने की प्रत्याशा में)तथा विशिष्ट अतिथि डा. जहां आरा सहायक प्रवक्ता, करामत महाविद्यालय, लखनऊ को नामित किया गया। संचालन का दायित्व स्वयं संयोजक केवल प्रसाद सत्यम  ने निर्वाह किया। इस गोष्ठी में औपचारिक परिचय और उद्घोषणा के उपरांत कवयित्री अलका अस्थाना ने अपने मधुर कंठ से मां शारदा की स्तुति में, वाणी वंदना प्रस्तुत किया तो गोष्ठी का पूरा परिवेश संवेदनाओं की भावुकता  से रसमय हो गया। वंदना के बोल देखिए–

”प्रेम की बंशी बजा दो,

भावनामय शारदे।।

अगली कवयित्री इंद्रासन सिंह ’इन्दु’  को आमंत्रित किया गया। इंदू  ने  शहर की आपाधापी से बहुत दूर गांव के कोमल भावनाओं को बचपन से जोड़ कर एक जीवंत गीत प्रस्तुत किया–

"आओ आज दिखाएं तुमको, 

झांकी अपने गांव की।

हाथ बंटाते सब हिलमिल कर, 

भाव नहीं है दुराव की।।"

गांवों की गलियों से स्कूल और बाग घूमते हुए हम सभी को अपने बचपन और बाल कृष्ण की लीलाएं स्मृति हो आई। विशेष मांग पर अपने एक कृष्णभावनाभावित भाव से सिक्त गीत भी सस्वर सुनाया। सभी का मन आह्लादित हो गया–

”राधा भीगे कन्हाई रंग की धारा में..।”

कवियों की कम संख्या की दृष्टि में विविधता न होने के कारण संचालक महोदय ने स्वयं ही गोष्ठी के गीतमय वातावरण को आल्हा छंद के माध्यम से बदलने का सफल प्रयास किया। यह छंद वर्षा ऋतु के माध्यम से कन्या भ्रूण हत्या को रेखांकित करते हुए लिंग समानता का एक सामाजिक संदेश देने में सफल है। एक बंद देखे– 

”वर्षा से उपजी यह बिटिया, लक्ष्मी दुर्गा धरा कहाय।

गगन पिता की प्यारी चिड़िया, ब्रह्म प्राण से समता पाय।।

हाड़ मांस के इस पिंजरे में, जब तक रहती मन को मार।

जीता है तू प्राणी बन कर, मत कर तू जग का संहार।।”

इसके बाद संचालक ने पुन: अलका अस्थाना को उन्हें काव्य पाठ करने हेतु आमंत्रित किया।  अलका ने अपने कोकिला स्वर में एक बार फिर मधुर गीत पढ़ कर सबको बहुत प्रभावित किया।

”न जाने  कब रात हो जाये।

शहर में  बरसात  हो  जाये।”

अब बारी थी मंच की ओर चलने की तो इस संस्था की काव्य गोष्ठी में प्रथम बार प्रतिभाग लेने वाली डा. जहां आरा, विशिष्ट अतिथि ने अपने चंद मुक्तक और एक नज़्म/ कविता से ’बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ’ को बखूबी सशक्त शब्द दिए–

”समाज में अपना मकाम पाने के लिए

झूम उठीं  अपना  वकार  पाने के लिए।

साफे हस्ती से ज़ुल्म मिटाने के लिए

अब्र बन कर बिजली गिराने के लिए”

आज की गोष्ठी अपने चरम पर पहुंच चुकी थी और इसी के साथ ही समय अपना कदम चांद पर रखने को बेताब था। तभी संचालक ने इस गोष्ठी के महनीय अध्यक्ष सुनील कुमार बाजपेई  को काव्य पाठ करने हेतु आमंत्रित किया। अध्यक्ष महोदय जी ने अपने संक्षिप्त उद्गार में गोष्ठी को अत्यधिक रोचक, सफल और सामाजिकता को नई दिशा देने वाला बताया। कवि और कवयित्रियों के प्रस्तुतिकरण की जहां सराहना की वहीं उन्हें रचना की कर्मशीलता को सकारात्मक रखने को प्रोत्साहित भी किया।  आपने आज पिता दिवस पर अपने कुछ मुक्तक छंद और दो गीत भी सस्वर प्रस्तुत किए, जिसे खूब सराहा गया–

”परम स्थान है माँ का, पिता का कम नहीं होता,

बड़ा संतान को करने में जो अस्तित्व खुद खोता l

भले देती जनम संतान को माँ पर पिता भी तो,

बिना स्वारथ के जिम्मेदारियों को सहज ही ढोता l”

अन्त में, गोष्ठी में प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापन इंद्रासन सिंह इंदू ने किया तथा अध्यक्ष महोदय  की अनुमति से इस यादगार काव्य संध्या को अगली गोष्ठी होने तक स्थगित किया गया।

आप सभी मित्रो के अनमोल सहयोग से राजकर्मचारी साहित्य संस्थान, लखनऊ अपने उद्देश्य में लगातार सफलता के साथ अग्रसर है।

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